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प्रद्युम्न सर | हिन्दी प्रेरक Article | सत्य घटनाओं पर आधारित



प्रद्युम्न सर  : हिन्दी प्रेरक कथा

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । 
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥


आज तक कई कहानियाँ लिखी और पढ़ी एवं लिखी गईं लेकिन यह आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाली है क्योंकि इस कहानी में न किसी का महिमामंडन किया गया है न ही अतिश्योक्ति लगाकर कहानी को रोचक बनाया गया है | मुझे बिलकुल भी ज्ञान नहीं है कि ऊपर लिखी गईं पंक्तियाँ लेखन को किस प्रकार से प्रभावित करती हैं लेकिन यह ज़रूर पता है कि पूरी कहानी पढ़ने के बाद आपको बहुत कुछ सीखने का आनंद प्राप्त होगा, उसी प्रकार जिस प्रकार से मुझे और मेरे सहपाठियों को प्राप्त हुआ | पढ़ें मेरी यह कहानी "प्रद्युम्न सर" |
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महाविद्यालयों में वार्षिक खेल-कूद प्रतियोगिताएँ संचालित कराई जाती हैं, ठीक वही समय चल रहा था, कुछ अज्ञात कारणों से प्राचार्य महोदय क्रिकेट खेलने की अनुमति दे ही नहीं रहे थे | कुछ नालायक दोस्तों ने मुझे साथ में लिया और हम सभी जाकर प्राचार्य कार्यालय के सम्मुख मूर्ति बने खड़े थे | सभी आ-जा रहे थे लेकिन हम मूर्तियाँ ज्यों की त्यों खड़ी थीं | अचानक प्रद्युम्न सर आ गये कुछ परेशान लग रहे थे, उन्होंने कभी अपने छात्रों को नज़रन्दाज़ नहीं किया इसलिए इस बार भी उन्होंने देखा कि मैं अपने दोस्तों के साथ आवेदन पत्र लेकर खड़ा हूँ | हा हा हा.... उन्होंने पूँछ ही लिया यहाँ कैसे खड़े हो, मैंने तो कुछ नहीं बोला लेकिन किसी ने कहा "प्रिन्सिपल सर को एप्लीकेशन देना है |" आदतन उन्होंने अपना हाँथ अपने मांथे पर रखा और बोले," यहाँ इतने काम अटके पड़े हैं कि मैं चाहूँ तो दिनभर आवेदन लिखूँ और कुछ न करूँ |" 

मुझे एक बात समझ में आई कि केवल आवेदन ही हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता, जिस प्रकार से शतरंज के खेल में  एक अकेला हाँथी कुछ नहीं कर सकता उसी प्रकार से, कर्मठता रुपी कोई दूसरी गोटी होना आवश्यक है | मैंने जब भी देखा प्रद्युमन सर कुछ न कुछ कर ही रहे थे, मैं भी प्रेरित हुआ | कहते हैं एक ही प्रवृत्ति के दो व्यक्ति एक दूसरे को समझते हैं, समझ का छोटा सा हिस्सा मुझे भी धीरे-धीरे आ रहा था | मेरी पसन्दीदा विषय strength of material है , लेकिन सरजी ने इन तीन वर्षों में मुझे strength of a man पढ़ा दी | उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि द्रोणाचार्य के महत्त्व से ज्यादा अर्जुन के महत्त्व को स्वीकार करते हैं, रामकृष्ण परमहंस से अधिक महत्वपूर्ण विवेकानन्द को मानते हैं | कभी- कभी मुझे ऐसा भी प्रतीत हुआ कि उनका मानना है कि गुरु और शिष्य दोनों ही ज्ञान और कौशल के सौ प्रतिशत के भागीदार हैं क्योंकि उनकी पढ़ाने की तकनीकी ही ऐसी है | फ़िज़ूल बातें किये बिना विषय पर डटे रहने वाले मेरे अनुभव में एच. सी. वर्मा जी के बाद ये दुसरे व्यक्ति हैं |  मैं हमेशा आश्चर्य चकित रहा कि दिनभर एक केबिन से दुसरे केबिन में घूमने वाला यह मासूम व्यक्तित्व कक्षा में इतनी आसानी से इतनी देर तक पढ़ाता कैसे है | बिना किसी पर चिल्लाए, और न ही टाइम पास करने के लिए इन्होंने कभी छात्रों से तिरछे प्रश्न पूँछे, मात्र पढ़ाया नहीं उससे भी अधिक समझाया | सार यह है कि प्रद्युम्न सर ने नौकरी पर रहते हुए कभी नौकरी की ही नहीं

गेट ट्रेनिंग कार्यक्रम चल रहा था, कक्षाएँ समय सारणी के अनुसार संचालित की जा रही थीं | मुझे कुछ काम दिया गया था | जिसका लिखित विवरण लेकर मैं सर की केबिन में गया, सर अपनी केबिन में झाड़ू लगा रहे थे |

"मे आई कम इन सर", मैंने दरवाजे के पास खड़े होकर पूँछा |

"हाँ! आओ सुमित", सर झाड़ू लगाते हुए बोले |

"सर, यह काम हो गया", मैंने कहा |

"इधर टेबल में रख दो", सर ने टेबल की ओर इशारा किया |

"सर आप झाड़ू क्यों लगा रहे हैं?", मैंने पूँछा |

"अरे क्या बताऊँ यार", दरवाज़े के कोने को साफ़ करते हुए उन्होंने कहा |

"सर, झाड़ू ज़रा ऊपर कीजिये", मैंने मोबाइल का कैमेरा चालू करके कहा |

"क्या कर रहे हो?", सर ने पूँछा |

"छोटा सा बदलाव सर", मैंने थोड़ा सा मुस्कुराकर कहा |


मैं चित्र उतारकर चुपचाप कक्षा में आ गया | अपने एक कनिष्ठ को सन्देश भेजा कि एक घंटे के भीतर यह फ़ोटो कॉलेज के सभी ग्रुप्स में दिखना चाहिए | उसने भेजना शुरू कर दिया, लगभग सभी समूहों में फ़ोटो साझा हो गया | मैं यहीं नहीं रुका, मैंने फेसबुक पर लिखा, "लगता है 1968 के बाद  रीवा इंजीनियरिंग कॉलेज में सफाई कर्मी भर्ती नहीं हुए |" उस पोस्ट में कॉलेज के सभी प्रोफेसरों को टैग कर दिया | पुनः बखेड़ा खड़ा करवा दिया मैंने.. हा हा हा....! अन्तर्मुखी प्रद्युम्न सर के लिए उनका बहिर्मुख बनकर मुझे अच्छा लगा | प्रद्युम्न सर जी की शायद पेशी लग गई, उन्होंने मुझे फ़ोन किया और फेसबुक पोस्ट को मिटाने का आदेश दिया | 

असल में कुछ बातें गोपनीय ही रहें तो अच्छा है | मुझे नहीं लगता कि कोई ऐसा विषय है जिसमें सर जी की पकड़ नहीं है | मैं पाठ्यक्रम की नहीं जीवन के विषयों की बात कर रहा हूँ | जिस प्रकार से एक किसान बीजों को बोकर उन्हें पानी और खाद देकर कीटनाशकों का प्रयोग करना नहीं भूलता, प्रद्युम्न सर भी कभी नहीं भूले | समय-समय पर अपने बुद्धि रुपी खुर्पिओं का उपयोग करके हमारे खेत रुपी कॉलेज को खरपतवारों से बचाने का अथक प्रयास किया | संस्कृत में एक श्लोक है :

धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः । 

तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते ॥

अर्थात्, धर्म को जाननेवाले, धर्म मुताबिक आचरण करनेवाले, धर्मपरायण, और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं ।

अगर सत्य कहूँ तो प्रद्युम्न सर ऐसे ही गुरु हैं, और गुरु अगर उपरोक्त श्लोकानुसार हैं तो छात्रों को नीचे लिखे श्लोक बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती :

शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।

नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥

अर्थात्, शरीर, वाणी, बुद्धि, इंद्रिय और मन को संयम में रखकर, हाथ जोडकर गुरु के सन्मुख देखना चाहिए ।

और

नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसंनिधौ ।

गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥

अर्थात्, गुरु के पास हमेशा उनसे छोटे आसन पे बैठना चाहिए । गुरु आते हुए दिखे, तब अपनी मनमानी से नहीं बैठना चाहिए ।

शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए हर संस्थान में मात्र एक-एक  प्रद्युम्न सर सर की आवश्यकता है | तब राष्ट्रगान में लिखा गया "भारत भाग्य विधाता जय हे" अपना वास्तविक रूप ले पायेगा | 

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लेखक : कविकुमार सुमित (सर्वाधिकार सुरक्षित )