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क्या हमें करना यही था? | हिन्दी कविता by कविकुमार सुमित

 हिन्दी कविता : क्या हमें करना यही था? 



क्या हमें करना यही था?

देखकर के नए सपने,
छोड़कर के कई अपने,
अधखुले अधर प्यासे,
चल पड़े कुछ अलग कहने |

भेद देखा अभी कल में,
जान पाया किन्तु इतना,
जिस राह पर थे वे चले ,
उस राह पर चलना नहीं था |(दिशा)

क्या हमें करना यही था ?

अच्छा सुखी श्री कौन होगा ?
सोचकर सब मौन होगा,
कहो इसको विवश बोलू,
या कहूँ हैं रत्न मिलने ?

बहुत ऊपर बहुत नीचे,
कौन मुझको बल से खींचे,
सुनी जो आवाज सब ने,
है भजन धरना नहीं था | (कर्म)

क्या हमें करना यही था ?

अधिक पढ़कर अधिक मूरत,
कम पढ़ी मित्रों की सूरत,
जा रहे हैं वेद रटकर,
कीचड़ों में फूल खिलने |

त्रुटि हमारी आदतें थीं,
मान बैठे सगे सबको,
कह रहे थे ज़हर देकर,
भ्राता तुझे मरना नहीं था | (तर्क)

क्या हमें करना यही था ?

झूमता है रोम,
उछलता है व्योम,
देखो मुख की ओर उनके,
उस चमक के क्या कहने |

बन गया है स्वर्ग लेकिन,
आसमां यह लाल क्यों है,
खुदखुशी आदेश करती,
इस तरह बहना नहीं था | (परिणाम)

क्या हमें करना यही था ?
क्या हमें करना यही था ?






कविकुमार सुमित (सर्वाधिकार सुरक्षित)