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KaviKumar Sumit is an indian Hindi poet, author and comedian. He recites his poems in various stage shows in special occasions. MP government in year 2015 awarded him as Bal Pratibha Samman 2015, for his service in creative writing field. Now singing songs and hindi poems with a melodious voice is his passion.
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HINDI STORY : 10% आरक्षण By KaviKumar Sumit | Short Story On (CORRUPTION) Social Issues
पहली बात यह की, लेखक जो कुछ वर्णन करता है, सहृदय (पाठक) को पहले से पता होता है | सहृदय तो मात्र रोमांच के लिए विषयवस्तु का अध्ययन करता है, जिसके परिणाम स्वरुप वह सहानुभूति, जागरूकता और तथ्यों की जानकारी चाहता है | पाठकों में कुछ साहित्य के साधक भी होते हैं जो अपने पठन एवं लेखन को अधिक सुदृढ़, परिष्कृत एवं निरपेक्ष बनाने के लिए कहानियों, कविताओं का पाठ करते हैं | अब बात करते हैं उन लोगों की जो पढ़ नहीं सकते अर्थात निरक्षर हैं, क्योंकि वे निरक्षर हैं अतः शोषित हैं मेरी यह धारणा थी | लेकिन...
"घर में पड़े-पड़े दिनभर मोबाइल में सनीमा देखते रहते हो, घर के कुछ काम ही करो", पिताजी तौलिये से अपना मुँह पोंछते हुए बोले |
"हूँ", मै कोई फ़िल्म देख रहा था इसलिए बस इतना कहकर पुनः देखने लगा |
फ़िल्म समाप्त हुई, अपनी आँखे मीजते हुए मैं बाहर आँगन में रखी कुर्सी पर आकार बैठ गया | सोच रहा था क्या किया जाय कुछ करना चाहिए, तभी ख्याल आया की 2 महीने बाद क्लर्क की भर्ती का आवेदन खुलने वाला है | सरकार ने 10 प्रतिशत आरक्षण भी लागू कर दिया शायद उसमे नंबर लग जाये लेकिन मेरे पास इ डब्लू एस का प्रमाण पत्र ही नहीं है | चलो यही काम निपटा लेते हैं | सब कागज़ात देखें अन्दर जाके | मैं उत्तर वाले कमरे की ओर भागा | अन्दर जाकर पेटी का ताला खोला और अपने जन्म प्रमाण पत्र से लेकर ज़मीन के पट्टे तक लेकर बाहर निकला | माँ वहीँ बैठकर चावल पका रही थी |
"तू कहीं जा रहा है", माँ ने बैठे-बैठे ऊपर सिर करके पूँछा |
"हाँ, तहसील जाऊँगा", मैं आँगन में रखे अपने शर्ट को खोजते हुए ज़ोर से बोला |
"अरे इतना ज़ोर से मत बोल, तहसील जाने की बात पहले बता हुआ क्या है?" माँ से अपनी आवाज़ बहुत धीरे करके बोला |
"गाँव में जितनी ज़मीन है सब अपने नाम करवाने जा रहा हूँ", इतना कहकर मैं हँसने लगा |
माँ की सूरत देखकर पता चल गया कि माँ अब थोड़ा क्रोधित हो गई है |
"अरे मम्मी ई.डब्लू.एस. का कागज़ बनवाने जा रहा हूँ, जिससे सरकारी नौकरी जल्दी मिल जाती है", मैं थोड़ा शांत होकर बोला |
"ठीक है कुछ भी बनवा लेकिन किसी को बताना मत", माँ ने कहा|
“हाँ,ठीक है” मैंने कहा|
मैंने उन्हें झूँठा भरोसा दिलाकर शान्त किया लेकिन सच में मैं स्वयं किसी को नहीं बताना चाहता था कि मैं तहसील जा रहा हूँ | मैंने खाना खाया, कपड़े पहने और पोथियों का झोला लेकर चल पड़ा | मेरे घर से तहसील 25 किलोमीटर दूर है | वहाँ जाने के लिए किसी को भी 50 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, इतने ही आने के लिए भी | सड़क अब ठीक बन गयी है इसलिए एक घंटे से कम ही लगते हैं |तहसील पहुँच गया, मुख्य द्वार के बाहर कई लोग अपना कंप्यूटर और प्रिंटर लेकर बैठे थे | जैसे ही मैं बस से उतरा सब के सब मुझे ध्यान से देख रहे थे | मैंने देखा दायीं ओर एक दीवार पर तहसीलदार के कार्यालय जाने के लिए तीर का निशान बना था, मैं उसी तरफ़ हो लिया | मैं कार्यालय के करीब पहुँचा वहाँ आस पास कई लोग खड़े थे |
“भैया! ई.डब्लू.एस. बनवाना है, फॉर्म वार्म कहाँ मिलेगा ?” मैंने कार्यालय के बाहर खड़े एक सज्जन से पूँछा |
“एक काम करो अभी जहाँ से आए हो, मेन गेट के पास सुशील भैया होंगे उनसे ले लेना”, उन्होंने जल्दबाजी में कहा जाने का इशारा किया |
मैं मुख्य द्वार के पास पहुँचा और एक व्यक्ति के पास गया जो अपने कंप्यूटर में कुछ टाइप कर रहा था | मुझे नहीं पता वह वही है जिसके पास मुझे भेजा गया या नहीं |
“नमस्ते अंकल जी, ई.डब्लू.एस.का फॉर्म दे दीजिये”, मैंने निवेदन किया |
“ये लो, और 50 रुपये निकालो”, टाइप करते हुए ही उसने कहा |
मैंने देखा आवेदन पत्र के ऊपर 20 रुपये मात्र लिखे हुए हैं |
“लेकिन अंकल जी इसमें तो 20 लिखे हैं, फिर 50 क्यों ले रहे हैं” मैंने थोड़ा परेशान होकर पूँछा |
“बगल में 100 में मिल रहा है, दो नहीं लेना है तो जाओ” उसने थोड़ा झल्लाकर मुझसे कहा और आवेदन खींचने के लिए हाँथ आगे किया |
“नहीं-नहीं लीजिये आप, मुझे जल्दी घर भी जाना है, आप 50 ही रख लीजिये” मैंने 50 रुपये देते हुए उससे कहा |
“अंकल जी इसको भरना कैसे है और आगे क्या-क्या करना है?” मैंने पूँछा |
उसने टाइपिंग बंद कर दी और खड़ा हो गया , मेरे हाँथ से लेकर आवेदन पत्र के पन्ने पलटाने लगा
“देखो, यहाँ पर यहाँ पर अपने दस्तख़त कर देना, यहाँ-यहाँ अपनी जानकारी भर देना फिर पटवारी के पास जाकर दस्ख्वत करवा लेना, फिर यहाँ पर बाबू से इश्तहार निकलवा लेना……” जल्दी-जल्दी 2-3 मिनट में उसने मुझे समझा दिया क्या-क्या करना है |
मेरे शरीर से तो पसीना छूटने लगा, एक बार तो ये ख्याल आया छोड़ो नहीं बनवाते हैं | लेकिन किराया लगा कर आए हैं तो बनवा लेते हैं | मैंने आवेदन पत्र भरा और अगले दिन सुबह-सुबह पटवारी जी के घर जा पहुँचा | मुझे यह सलाह दी गई थी की उनके घर जाकर जल्दी काम हो जाते हैं | पटवारी साहब चाय पी रहे थे | पटवारी जी को नमस्ते किये और उनके पास रखी बेंच पर जाकर बैठ गए | पटवारी जी के पूँछने पर बताया कि ई.डब्लू.एस. प्रमाण पत्र के काम से आए हैं |
“आवेदन लेकर आए हो? दिखाओ” पटवारी जी ने पूँछा |
“जी लीजिये”, मैंने आवेदन दे दिया |
पटवारी जी ने नाम पता देखा और ज़मीन के रिकॉर्ड खंगालने लगे | थोड़ी देर बाद मेरी जानकारी मिल गई | मुझे लगा बस अब तो एक काम ख़त्म हो जायेगा जल्दी से तहसील चला जाऊँगा |
“हाँ, बताओ भाई कहाँ पर दस्तख़त करना है? पटवारी जी ने मुझसे पूँछा, मैं थोड़ा हैरान हुआ |
“यहाँ पर पटवारी जी”, मैंने पन्ना उलटा कर बताया |
“देखो भाई कुछ चाय-पानी का हो जाता तो ख़ुशी होती” पटवारी जी ने दाँत निकालकर कहा |
मैं भौचक्का रह गया, क्योंकि मैं अपने सामने भ्रष्टाचार होते हुए देख रहा था, लेकिन एक तरफ यह भी ख्याल आ रहा था कि बस एक यही तो काम है |
“कितने का चाय कितने का पानी पटवारी जी”, मैंने उनसे पूँछा |
“हाँ, बस 200 रुपये का” पटवारी जी ने कहा |
“पटवारी जी छात्र हूँ, 100 में कर दीजिये अगली बार बराबर कर लेंगे” मैंने असहाय होकर उनसे कहा |
“ठीक है लाओ जितना है, और ये लो आवेदन” पटवारी जी ने रूपए लेते हुए और आवेदन देते हुए कहा |
मुझे अब भी कोई बहुत बड़ा पछतावा नहीं हो रहा था | मुझे बस यही लग रहा था कि मेरा काम जल्दी हो गया और मैं अब बे फ़िक्र हूँ | लेकिन एक बात मन में गुस्से से सोच रहा था कि अगर इसी तरह से पटवारी जी चाय पीते रहे तो इनको मधुमेह जल्द ही होने वाला है|
मैं एक ओटो रिक्शा में सवार होकर पुनः तहसील पहुँच गया | कार्यालय में बैठे बाबू के पास गया, मुझे लगा अब मैं सब जानता हूँ |
“नमस्ते साहब ई.डब्लू.एस. बनवाना है, पटवारी के दस्तख़त हो गये हैं, इश्तहार निकलवा दीजिये”, मैंने बाबू से कहा |
“जल्दी निकलवाना है या नियम से, नियम से समय लगेगा जल्दी के लिए कुछ खर्चा करना पड़ेगा” बाबू ने कहा |
“कितना?” मैंने पूँछा |
“100-200 लगेंगे” बाबू ने कहा |
“50 लिया हूँ, करवा दीजिये छात्र हूँ” मैंने कहा |
“ठीक है, दो आवेदन मुझे” बाबू ने आवेदन माँगा |
बाबू ने आवेदन लिया और उसे फाइलों के गट्ठर में बाँधने लगा |
“लेकिन साहब इश्तहार दीजिये घर जाऊँगा” मैंने थोड़ा जोर से कहा |
“अभी-अभी पता चला है की ऑपरेटर की शादी होने वाली है तो वह 15 दिनों की छुट्टी लेकर गया है, अब वह आयेगा तब होगा काम”, बाबू गट्ठर बांधते हुए बोला |
“ठीक है आप अपना नंबर दे दीजिये” मैंने कहा |
बुरा फ़स गया मैं, बस मैं बार-बार यही सोच रहा था | यही सोचते 15 दिन बीत गये, बाबू से फोन पर बात करके पता चला कि ऑपरेटर आ गया है | मैं तीसरी बार तहसील पहुँचा | बाबू अपनी जगह बैठा हुआ था |
“नमस्ते अंकल जी, इश्तहार अब निकल जाएगा न ?” मैंने पूँछा |
“हाँ, फ़ाइल देखता हूँ तुम्हारी” बाबू ने कहा |
मैं वहीँ खड़ा हो गया, कुछ देर बाद बाबू बाहर आया |
“यार तुम्हारी फ़ाइल नहीं मिल रही,लेकिन चिंता मत करो यहीं होगी बिना फ़ाइल के इश्तहार निकलवा देता हूँ” बाबू ने कहा |
“अब क्या करूँ मैं?”, मैंने पूँछा |
“अरे, हो जायेगा लेकिन ऑपरेटर को 100 देना पड़ेगा तब होगा”, बाबू ने कहा |
“ठीक है, आप करवाओ लो आप अभी” मैंने यह कहते हुए 100 रुपये बाबू को दे दिए |
बाबू अन्दर गया और एक गट्ठर खोलने लगा | उसमें से उसने एक फ़ाइल निकाली और
“अरे ये तो यहाँ रखी थी, रुको अभी इश्तहार लाता हूँ, बाबू ने ढोंग करते हुए कहा |
मेरे पैरो तले ज़मीन खिसक गई, मैंने बाबू को मन ही मन दण्डवत प्रणाम कर लिया | कुछ देर बाद बाबू इश्तहार लेकर आया | मैंने इश्तहार लिया घर आया, उसमे सचिव के दस्तख़त करवाए | गवाहों के दस्तख़त स्वयं कर लिए | मुझे डर था कहीं गवाह ना माँगने लगें चाय पानी क्योंकि वो मेरे गाँव के भी थे | ये सब करके मैं चौथी बार तहसील पहुँचा | पुनः मेरी फ़ाइल खो गई थी | उसके मिल जाने के लिए मैंने बाबू को पुनः 50 रुपये दिए | और उसके 4-5 दिन बाद मेरा ई.डब्लू.एस. मेरे सामने था इसके लिए मुझे पांच वी वार तहसील जाना पड़ा | बाबू ने ई.डब्लू.एस. प्रमाण पत्र मेरे हाँथ में दे दिया परन्तु पुनः चाय के लिए भीख माँग रहा था | मैंने उसे बोला कि अब मैं तुम्हारी शिकायत कर दूँगा अगर फ़िर से तुमने कुछ प्रयास किया तो | कुल मिलकर 5 बार मैं तहसील गया उसके 500 रुपये और बांकी खर्च 500 रुपये कुल एक हज़ार रुपये लगे दस प्रतिशत आरक्षण लेने के लिए अर्थात सौ रुपये का एक प्रतिशत | लेकिन मेरा काम हो गया |
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