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Chapter-1: Caught With Friends | The Teen Agent (IN HINDI) By KaviKumar Sumit | STORY OF A YOUNG SPY

THE TEEN AGENT CHAPTER 1 BY KAVIKUMAR SUMIT

Chapter-1: Caught With Friends (HINDI)

मैं मेरी दुनिया में खुश होता जा रहा था | नए दोस्त बने, नई जगह में नए-नए लोग मिले, शायद मैं अपने अतीत को भूलने की तैयारी करने लगा था | मैंने कई ऐसे काम किये जो न किसी सरकारी फ़ाइल में दर्ज है न ही कोई और इसकी जिम्मेदारी अपने सर पे लेना पसंद करेगा | न मेरे साथ कम करने वाले मेरे सहयोगी न मुझे आदेश देने वाले सरकारी अफ़सर और न ही मेरे नाम की सिफ़ारिश करने वाला कोई दलाल |

रोज़ की तरह मैं और मेरा दोस्त (रूम पार्टनर) ठीक साढ़े नौ बजे ही कॉलेज के लिए निकल पड़े | हमेशा की तरह सब्जी बेचने वाली चाची से बेमतलब धनिया माँगकर आज भी हम दोनों ने  उन्हें चिढ़ाया | फिर किराने की दुकान पर बैठे दुकानदार से प्रणाम किया और मुख्य सड़क पर पहुँचे वहाँ गोल गप्पे वाले भैया मिले | आज फ़िर हमने उनसे पूँछा कि "कुछ उधार तो नहीं है भैया कल का" और उनका वही पुराना जबाव "तो आप लोग कौनसा भागने वाले है भैया जी" | फ़िर ऑटो कैड यानि स्टेशनरी की दूकान जहाँ जाकर अंकल जी को नमस्ते किये बिना हमारा खाया हुआ पचता ही नहीं था | उस बस्ती के लोगों में हमने अपना एक छोटा सा संसार खोज लिया था और उनकी आदत भी हमें लग गई थी | ये कुछ आभासी किन्तु वास्तविक लगने वाली खुशियाँ जारी रखी जा सकती थीं अगर मैं वह न होता जिसके बारे में कोई नही जनता था | कॉलेज में प्रवेश लिए अभी कुछ ही महीनें हुए थे लेकिन हम दोनों अलग थे क्योंकि वास्तव में हमारे विचार अलग थे | हमारी कक्षा में एक रूढ़िवादी सोच कायम थी लेकिन हमारी चाल अलग थी हमें किसी की सोच के बारे में अभी तक कोई परवाह नही थी | मेरा दोस्त अपने उम्र से दो साल बड़ी लड़की में रूचि लेने लगा और मुझमें मुझसे दो साल छोटी एक प्यारी सी लड़की | 

हम सभी के बीच काफ़ी घनिष्ट मित्रता भी हो गई थी लेकिन वरखा एक शिकायत हमेशा करती थी कहीं घूमने न जाने की | उसका और मेरा सम्बन्ध पता नहीं किस आधार पर था लेकिन मुझे भी उसके साथ ख़ुशी मिलती थी | मेरे दोस्त अनुभव और रेशमा का क्या मसला है कभी किसी को समझ में नहीं आया लेकिन मुझे हाहाहा... कुछ नहीं |

"आज फिर शिवम् एंड कम्पनी ने यहाँ बैग रख दिया यार ये सीट हमें चाहिए थी", अनुभव ने किसी के बैग को सरकते हुए कहा |
"अरे यहाँ बैठ जाते हैं इधर आ जाओ" मैंने उसे पीछे बुलाया |
"सुन रेशमा ने फ़ोन किया था कहीं जाने का प्लान है आज" अनुभव ने मेरे सामने खड़े होकर कहा |
"अरे ! ये लोग भी बस" मैंने अपना हाथ सर में छुआ कर बोला |
"तुम कही जाते नहीं और तुम्हारे चक्कर में मैं भी कहीं नहीं जा पाता" अनुभव ने अपना सर नीचे करते हुए बोला |

मैं समझ गया था कि वह क्या कहना चाहता है | मैं कुछ सोचने लगा, लेकिन तब तक कक्षा के कुछ सहपाठी आ चुके थे | अनुभव कक्षा के दरवाजे पर खड़ा होकर दायें हाँथ की ओर गैलरी में देखने लगा | मैंने उसे अपने पास बुलाया |

"ठीक है, बोलो कहाँ चलना है?' मैंने मुस्कुराते हुए पूँछा |
"रामबन जाने का प्लान है, अब तुम जगह मत बदलवा देना", अनुभव ने हँसते हुए कहा | 

तब तक वरखा, रेशमा और खुशबू भी आ चुके थे | ख़ुशबू को अपने घर जाना था और उन दोनों ने शायद उसे अपनी योजना में शामिल भी नहीं किया था | अनुभव जाकर उनके पीछे वाली सीट में बैठकर "कॉलेज लाइफ़ के लुफ्त" नाम का मजा लूटने लगा | वह सकारात्मक सोचता है लेकिन मैं सकारात्मक और नकारात्मक दोनों विचारो के मिश्रण पर आधारित निर्णय लेता था | शायद मेरे साथ होना उसे कारागृह में होने जैसा प्रतीत होता रहा हो लेकिन मैं सुलझी हुई घटनाएँ पसंद करता था | पूरी कक्षा में शोर ही शोर था मैं बाहर गया और अपने एक साथी को फ़ोन मिलाने लगा |

"हेलो, यार थोड़ी सी जानकारी चाहिए" मैंने कहा |
"बोलिए अन्नदाता, आपको मारे से क्या जानकारी चाहिए" फ़ोन से आवाज़ आई | 
"यार, रामबन जा रहा हूँ कुछ ख़ास दोस्तों के साथ" मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए कहा |
"तूने पहले से ही कांड कर रखा है अपने साथ एक रूम पार्टनर रखके, और ये ख़ास दोस्त जैसे लोग कबसे तेरे साथ होन लागे" थोड़ी ज़ोर आवाज़ कानों में आई |
"भाई अपनी बजा न मुझे जानकारी दे बस तू, बाकि मैं देख लूँगा" मैंने कहा |
"अरे जब ख़ुद ही देखने थे तो मारे को फ़ोन क्यों करा?" उधर से आवाज़ आई |
"डेढ़ बजे जाना है और चार बजे तक वापस आना है मूवमेंट, क्राउड और अपना कोई है या नही ये बता बस" मैंने कहा |
"देख भाई मैं तुझे आधे घंटे बाद फ़ोन करता हूँ" इतना बोलकर फ़ोन कट गया |

मैं लौटकर कक्षा में गया | अनुभव के बगल में बैठ गया | चारों योजना बना रहे थे | मैंने कहा यहाँ से सभी अलग-अलग जायेंगे फ़िर बस स्टैंड में मिलेंगे वहाँ से बस पकड़ेंगे | सभी के हामी भरते-भरते प्रोफ़ेसर कक्षा में आ गए | तीन पीरियड बीत गए लेकिन उधर से फ़ोन नहीं आया मुझे लगा कि शायद कुछ गड़बड़ हो सकती है लेकिन मैंने दोस्तों की ख़ुशी के लिए जाना के लिए मना नहीं किया | लंच ब्रेक हुआ और हम सभी बाहर निकले हम दोनों अलग ऑटो रिक्शा में और वह तीनों अलग ऑटो रिक्शा में सवार होकर बस स्टैंड पहुँचे | ख़ुशबू नाराज़ थी क्योंकि उसे नहीं ले जाया जा रहा था | वह कोई दूसरी बस पकड़ कर अपने घर चली गई | अनुभव, रेशमा की नक़ल करने में व्यस्त था, वरखा मुझे देखने में और मैं किसी के फ़ोन आने का इंतज़ार कर रहा था | सबकुछ सामान्य (नार्मल) लगे इसलिए बीच बीच में पंच लाइन बोल रहा था | हम एक बस में चढ़े लेकिन पीछे की तरफ से वहाँ बैठी सवारियां रेशमा और वरखा को घूर रहीं थी | मैंने ध्यान नही दिया लेकिन अनुभव ने सब को उतार लिया |

"क्या हुआ बे?", मैंने अनुभव से पूँछा |
"देख नहीं रहे थे कैसे घूर रहे थे", अनुभव ने दूसरी बस की ओर देखते हुए कहा |
"आओ इसमें चलते हैं" मैं दूसरी बस की ओर सभी को ले गया |

उस बस में सीट बिलकुल खाली नही थी | सभी ने मन ही मन निर्णय किया कि खड़े खड़े ही चलेंगे | अब बस में अलग दृश्य था शायद पहली बार लोग कॉलेज के छात्रों को इस तरह खड़े होकर जाते हुए देख रहे थे | किसी तरह मजाक करते हुए हम पहुँचे | जैसे ही हम बस से नीचे उतरे मेरे फोन में सन्देश आया "you are ordered to report me at your allocated" मैंने उत्तर दिया " I am unavailable till 5 pm" उसके बाद मैंने अपना फोन शान्त (साइलेंट) कर दिया | फोन आते रहे, लेकिन रामबन का एक अलग नजारा था एक तरफ भक्ति तो दूसरी तरफ प्रेमी-प्रेमिका मिलन केंद्र | लेकिन मेरे दिमाग़ में कुछ अलग ही उहापोह मची हुई थी बस देखने के लिए सब नार्मल था | हमने पूरा परिसर घूमा इसके बाद वहाँ अन्दर ही स्थित एक रेस्तरां में कुछ खाने-पीने के इरादे से गये | तीनो के साथ मैं भी खुश नज़र आ रहा था | सभी आमने सामने बैठ कर बातें करने लगे मैं भी बातें कर रहा था साथ ही बार बार मोबाइल फ़ोन देख रहा था | मैं और वरखा बाहर निकले, वह मुझसे बात कर रही थी | मैं इधर उधर देख रहा था इसी चक्कर में वापस रेस्तरां में आने के बाद मुझे भूल गया की उसने क्या क्या कहा | शायद हम दोनों ने अनुभव और रेशमा दोनों अकेले में बात कर सकें इसलिए, बाहर आए थे | हम लगभग नाश्ता फ़िनिश ही कर रहे थे की मेरी नज़र मोबाइल में गई मुझे फ़ोन आ रहा था जो बिलकुल ज़रूरी था | मैं अचानक बाहर निकला और फोन उठाया |

"हेलो, जय हिन्द सर" मैंने कहा |
"जय हिन्द, विक्रम, कैसे हो" फोन से आवाज आई |
"ठीक हूँ" मैंने कहा |
"कहाँ हो" उन्होंने पूँछा |
"सर, जरूरी काम से बाहर हूँ" मैंने कहा |
"तुम कब से ज़रूरी काम छोड़कर रेशमा,अनुभव और वरखा के साथ बहुत ज़रूरी काम करने लगे?" थोड़ी नारजगी भरी आवाज |
"सॉरी सर, मैं जल्दी लौटूंगा" मैंने कहा |
"अगर तुम्हे इनके कारण कुछ परेशानी हो रही हो तो बताओ, देशसेवा करो या फिर स्वयंसेवा | तुम अब निर्णय ले सकते हो एजेंसी या दोस्त", फोन के उस तरफ से आवाज़ आई |

फ़ोन कट गया, मैं उनकी बात समझने का प्रयास करने लगा की आखिर मेरे दोस्तों से मुझे क्या परेशानी होगी | लेकिन मुझे समझ आ गया कि असली परेशानी किसे है, जिसे डर है कि मैं कही सब पर्दे उठा न दूँ | मैंने थोड़ा जल्दबाजी दिखाई और सभी को वापस चलने के लिए कहा |


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